ईरान में राजनीतिक और सामाजिक तनाव चरम पर पहुंच गया है, जहाँ सरकार ने देशभर में इंटरनेट और टेलीफोन नेटवर्क को बंद कर दिया है, और संयुक्त राष्ट्र को एक गंभीर पत्र लिखकर अमेरिका पर “धमकियों” और विदेशी हस्तक्षेप के आरोप लगाए हैं। यह हालात देश के अंदर व्यापक विरोध प्रदर्शनों के कारण उत्पन्न हुए हैं, जिनके संकेत अब राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति दोनों आयामों में दिखाई दे रहे हैं।
इंटरनेट और मोबाइल फोन सेवा में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी का निर्णय उन दिनों में लिया गया जब सरकार ने देशभर में बढ़ती विरोध प्रदर्शनों का सामना करना शुरू कर दिया। रिपोर्टों के अनुसार राष्ट्रीय इंटरनेट कनेक्टिविटी लगभग सामान्य स्तर के केवल 1% तक घट गई थी, जिससे नागरिकों की संवाद और सूचना पहुँच लगभग पूरी तरह से बाधित हो गई। इस डिजिटल ब्लैकआउट का मकसद विरोधों को दबाना और बाहरी दुनिया में होने वाली गतिविधियों की रिपोर्टिंग को रोकना बताया जा रहा है।
इन प्रतिबंधों के साथ ही ईरानी अधिकारियों ने अमेरिका पर आरोप लगाया है कि वह देश के आंतरिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप कर रहा है और विरोधों को भड़काने के प्रयासों में लगा हुआ है। ईरान ने इस्लामिक गणराज्य के स्थिरता को खतरे में डालने और प्रशासन के खिलाफ “उत्तेजना फैलाने” के लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया है और इसी के विरोध में उसने संयुक्त राष्ट्र को एक औपचारिक शिकायत पत्र भेजा है।
ईरान के इस कदम ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच चिंताओं को बढ़ा दिया है। संयुक्त राष्ट्र सहित कई देशों ने ईरानी इंटरनेट और टेलीफोन संचार को रोकने के निर्णय की निंदा की है, क्योंकि यह मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन माना जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि संचार के ऐसे ठहराव से नागरिकों की आवाज़ दबाई जा रही है और देश के भीतर और बाहर वास्तविक स्थिति को छुपाया जा रहा है।
सामाजिक मीडिया पर उपलब्ध सीमित आंकड़ों और स्वतंत्र स्रोतों के अनुसार यह इंटरनेट और नेटवर्क ब्लैकआउट निर्णय अचानक नहीं लिया गया है। देश में पिछले कई हफ्तों से विरोध प्रदर्शनों की लहर चल रही थी, जो आर्थिक कठिनाइयों, मुद्रास्फीति की उच्च दर, बेरोज़गारी और राजनीतिक असंतोष के कारण शुरू हुई थी। इन मुद्दों ने जनता में व्यापक निराशा और असंतोष पैदा किया, जिसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर सड़क प्रदर्शन और सरकारी नीतियों के खिलाफ नारेबाज़ी देखी गई।
ईरानी अधिकारियों का कहना है कि यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा और देश में अशांति को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक था, जबकि विरोधियों का मानना है कि इससे सरकार सूचना को नियंत्रित कर रही है और उत्पीड़नकारी कार्रवाईयों को छिपा रही है। इससे पहले भी ईरान ने इंटरनेट ब्लैकआउट का उपयोग विरोधों को नियंत्रित करने के लिए किया है, और अब यह तरीका आधुनिक युग में फिर से उभर रहा है।
इस समय ईरान में हालात संवेदनशील बने हुए हैं, और देश के अंदर तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक दबाव लगातार बढ़ रहा है। भविष्य में इन प्रतिबंधों के प्रभाव और सरकार तथा जनता के बीच बढ़ते तनाव पर दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं।

















