ट्रंप का बड़ा फैसला: अमेरिका 60 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर, UN में मचा हड़कंप!

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ट्रंप का ‘अमेरिका फर्स्ट’ 2.0: 60 से अधिक अंतरराष्ट्रीय संगठनों को छोड़ने का ऐतिहासिक फैसला

दुनिया की राजनीति में आज उस समय हड़कंप मच गया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़े कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर करते हुए संयुक्त राज्य अमेरिका को 60 से अधिक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकालने की घोषणा की। इन संगठनों में संयुक्त राष्ट्र (UN) से जुड़ी 31 महत्वपूर्ण संस्थाएं भी शामिल हैं। ट्रंप का यह कदम उनके ‘अमेरिका फर्स्ट’ (America First) एजेंडे की ओर अब तक का सबसे बड़ा और आक्रामक कदम माना जा रहा है।

क्या है इस फैसले का मुख्य कारण?

राष्ट्रपति ट्रंप का तर्क है कि इन बहुपक्षीय संगठनों में अमेरिका हर साल अरबों डॉलर खर्च करता है, लेकिन इसके बदले में देश को वह लाभ या सुरक्षा नहीं मिलती जिसका वह हकदार है। व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि अमेरिका अब उन संधियों या संगठनों का हिस्सा नहीं रहेगा जो अमेरिकी संप्रभुता (Sovereignty) को कमजोर करते हैं या जहां अमेरिकी करदाताओं का पैसा बिना किसी ठोस परिणाम के खर्च हो रहा है।

कौन से संगठनों पर गिरेगी गाज?

हालांकि अभी पूरी सूची को आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक किया जाना बाकी है, लेकिन सूत्रों के अनुसार, मानवाधिकार परिषद (UNHRC), यूनेस्को (UNESCO), और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जैसे बड़े नाम इस सूची में शामिल हो सकते हैं। 31 UN संस्थाओं से बाहर निकलने का मतलब है कि इन संगठनों के बजट में भारी कटौती होगी, क्योंकि अमेरिका इनका सबसे बड़ा फंड देने वाला देश रहा है।

वैश्विक राजनीति और भारत पर प्रभाव

ट्रंप के इस फैसले से दुनिया के शक्ति संतुलन (Balance of Power) में बड़ा बदलाव आ सकता है। जानकारों का मानना है कि यदि अमेरिका इन मंचों से हटता है, तो चीन इन खाली जगहों को भरने की कोशिश करेगा, जिससे वैश्विक कूटनीति में बीजिंग का प्रभाव बढ़ सकता है। भारत जैसे देशों के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है, क्योंकि उसे अब एक नए बहुपक्षीय ढांचे में अपनी जगह बनानी होगी।

दुनिया भर में खलबली और प्रतिक्रियाएं

यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों ने इस फैसले पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन, वैश्विक स्वास्थ्य और आतंकवाद जैसे बड़े मुद्दों से लड़ने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है और अमेरिका के बिना ये संगठन कमजोर पड़ जाएंगे। वहीं, अमेरिका के भीतर भी इस फैसले को लेकर दो फाड़ है; जहाँ ट्रंप के समर्थक इसे साहसिक कदम बता रहे हैं, वहीं विपक्षी इसे ‘आइसोलेशनिज्म’ (अलगाववाद) की ओर खतरनाक कदम मान रहे हैं।

निष्कर्ष

डोनाल्ड ट्रंप का यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि यह उस विश्व व्यवस्था के अंत की शुरुआत हो सकती है जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी थी। आने वाले हफ्तों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ये 60 संगठन अमेरिका के बिना कैसे सर्वाइव करते हैं और वैश्विक राजनीति की नई दिशा क्या होती है।

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