चंडीगढ़: वित्त मंत्री हरपाल चीमा ने सदन में पेश किए अहम आँकड़े, कांग्रेस और विपक्ष पर साधा निशाना
पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने विधान सभा सत्र के दौरान कई महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं और विपक्षी दलों पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने स्पष्ट किया कि पंजाब को किसी भी हाल में पुरानी पेंशन योजना (OPS) को लागू करने से पीछे नहीं हटना चाहिए।
1. पुरानी पेंशन योजना (OPS) पर बड़ा दावा
वित्त मंत्री चीमा ने सदन में बताया कि पुरानी पेंशन योजना लागू करने के लिए सरकार को प्रति वर्ष 1600 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ सकता है। उन्होंने विपक्ष के इस दावे को खारिज किया कि पंजाब को OPS लागू नहीं करना चाहिए।
चीमा ने कहा कि पंजाब के पास 3 लाख 3 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है, जिसमें ₹1,600 करोड़ का भार उठाना कोई बड़ी बात नहीं है। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों को उनका हक मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पुरानी पेंशन योजना को दोबारा लागू करना पंजाब के कर्मचारियों को बड़ी राहत प्रदान करेगा।
2. कांग्रेस पर साधा निशाना: ‘मुफ्तखोरी’ की संस्कृति
वित्त मंत्री ने कांग्रेस पार्टी पर हमला बोलते हुए कहा कि उनके समय में ‘मुफ्तखोरी’ की संस्कृति चलाई गई, जिसके कारण पंजाब को भारी कर्ज और वित्तीय समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
चीमा ने कांग्रेस को चुनौती दी कि वे केंद्र सरकार को यह कहें कि पंजाब का बकाया फंड जारी किया जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस हमेशा पंजाब के लोगों के हक को दबाने का काम करती रही है। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार का लक्ष्य पंजाब को वित्तीय तौर पर आत्मनिर्भर बनाना है और वे किसी भी हाल में केंद्र से पंजाब के हक का एक भी पैसा नहीं छोड़ने देंगे।
3. 20 करोड़ रुपये के डेथ सर्टिफिकेट पर सवाल
वित्त मंत्री हरपाल चीमा ने एक चौंकाने वाला खुलासा करते हुए कहा कि कांग्रेस के शासनकाल के दौरान मृत्यु प्रमाण पत्र (Death Certificate) जारी करने पर भी 20 करोड़ रुपये का ख़र्चा आया था।
उन्होंने सदन को बताया कि इस कार्यक्रम के तहत 2017 से 2022 तक कुल ₹20.61 करोड़ का खर्च किया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि एक डेथ सर्टिफिकेट जारी करने पर इतना बड़ा खर्च क्यों किया गया, जबकि 481 करोड़ रुपये की राशि तो केंद्र से सीधे मृतक के परिजनों को भेजी जाती है। चीमा ने विपक्ष को घेरा और कहा कि उनके समय में हर चीज में भ्रष्टाचार किया गया था।
वित्त मंत्री ने इन तीनों मुद्दों के माध्यम से स्पष्ट कर दिया कि सरकार कर्मचारियों के हित और वित्तीय सुधारों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है, जबकि पिछली सरकारों ने केवल वित्तीय कुप्रबंधन किया।


















